मुख्य बातें
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अगर आपको लग रहा है कि आपके मोहल्ले का चाट या समोसे वाला ठेला अचानक कम दिखने लगा है, तो असल कहानी “बैन” की नहीं, बल्कि जागरूकता की है। जुलाई 2025 में केंद्र सरकार और ICMR-NIN ने सरकारी दफ्तरों में “Oil and Sugar Boards” लगाने का निर्देश दिया, जिनमें समोसे, जलेबी, वड़ा पाव जैसी चीज़ों में मौजूद तेल और चीनी की मात्रा को साफ तौर पर दिखाया गया।
मकसद किसी खास स्नैक को बंद करवाना नहीं, बल्कि लोगों को यह समझाना है कि बार-बार तला हुआ और ज्यादा चीनी वाला खाना समय के साथ वज़न बढ़ने और दूसरी मेटाबॉलिक समस्याओं का कारण बन सकता है। खासकर जब मोटापा और डायबिटीज़ साथ मौजूद हों, तो रोज़ के खाने की आदतों पर ध्यान देना और भी जरूरी हो जाता है। इसी वजह से संतुलित आहार और वज़न प्रबंधन केवल वजन कम करने की बात नहीं, बल्कि लंबे समय तक मेटाबॉलिक हेल्थ को संभालने का हिस्सा है।
सरकार की चेतावनी क्या है?
जुलाई 2025 में स्वास्थ्य मंत्रालय ने सभी केंद्रीय दफ्तरों को निर्देश दिया कि वे लॉबी, कैंटीन और मीटिंग रूम में “Oil and Sugar Boards” लगाएं, जिनमें समोसा, जलेबी, वड़ा पाव, कचौरी जैसे लोकप्रिय स्नैक्स में मौजूद चीनी और तेल की मात्रा साफ दिखाई गई हो। यह किसी खाने पर पाबंदी नहीं थी, बल्कि लोगों को अपनी खाने की आदतों पर ध्यान देने के लिए एक “व्यवहारिक याद दिलाने वाला” (behavioural nudge) कदम था।
मीडिया में शुरू में यह खबर आई कि सरकार ने समोसे-जलेबी पर सीधे चेतावनी लेबल लगाने का आदेश दिया है। इसके अगले दिन ही स्वास्थ्य मंत्रालय ने साफ किया कि यह किसी एक स्नैक के लिए नहीं, बल्कि सभी तरह के तेल-चीनी वाले खाने के लिए एक सामान्य जागरूकता पहल है। लगातार ज्यादा चीनी का सेवन इंसुलिन रेजिस्टेंस और बढ़ते ब्लड शुगर से जुड़ सकता है, जबकि ज्यादा तेल और तला हुआ खाना वज़न और हृदय स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है।
इसी कड़ी में, सितंबर 2026 में FSSAI ने एक कदम और आगे बढ़ते हुए पैकेज्ड फूड जैसे चिप्स, बिस्किट और मीठे ड्रिंक्स पर सीधे लाल रंग के चेतावनी निशान लगाने की योजना का प्रस्ताव रखा है, जो दो चरणों में लागू होगी।
“चीनी और ट्रांस फैट अब नई तंबाकू हैं। लोगों को यह जानने का हक़ है कि वे क्या खा रहे हैं।”
— डॉ. अमर अमाले, कार्डियोलॉजिस्ट, कार्डियोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया, नागपुर चैप्टर (टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में उद्धृत)
अगर रोज़ के खाने में तेल और चीनी की मात्रा पर ध्यान देना मुश्किल हो रहा है, तो सिर्फ़ खाने की चीज़ों को बदलना ही पर्याप्त नहीं हो सकता। संतुलित आहार, नियमित शारीरिक गतिविधि और समय-समय पर अपने वज़न, ब्लड शुगर और दूसरे मेटाबॉलिक पैरामीटर्स की जाँच करना भी जरूरी है। आपकी रिपोर्ट और स्वास्थ्य स्थिति के आधार पर डॉक्टर यह समझने में मदद कर सकते हैं कि किन बदलावों की आपको सबसे ज्यादा जरूरत है।
अपने वज़न और मेटाबॉलिक हेल्थ की स्थिति समझने के लिए आज ही हेल्थ असेसमेंट बुक करें।
आपकी पसंदीदा चाट-पकौड़ी में असल में कितना तेल और चीनी छुपा है?
ICMR-NIN की डाइटरी गाइडलाइंस 2024 के मुताबिक, कोई भी खाना “HFSS” (High Fat, Sugar, Salt) तब कहलाता है जब उसमें कुछ तय सीमाओं से ज़्यादा चीनी, तेल या नमक हो। यह सीमा नीचे तालिका में साफ-साफ दी गई है:
| पोषक तत्व | सीमा (कब माना जाए ज़्यादा) |
| चीनी | कुल कैलोरी का 10% से ज़्यादा हिस्सा सिर्फ चीनी से आना |
| तेल/फैट | कुल कैलोरी का 15% से ज़्यादा हिस्सा तेल/फैट से आना |
| नमक | प्रति 100 ग्राम ठोस खाने में 625 मिलीग्राम से ज़्यादा नमक |
समोसा, वड़ा पाव, कचौरी, जलेबी, पकौड़े जैसी चीज़ें अक्सर इन तीनों सीमाओं को पार कर जाती हैं, खासकर जब इन्हें बार-बार इस्तेमाल हो चुके तेल में तला जाता है। बार-बार गर्म किए गए तेल में खाना पकाने से स्वास्थ्य पर असर पड़ सकता है, इसलिए ऐसे खाद्य पदार्थों को रोज़ की डाइट का हिस्सा बनाने की बजाय कभी-कभार खाई जाने वाली चीज़ के तौर पर देखना बेहतर है।
अगर बीच-बीच में कुछ खाने की इच्छा हो, तो तले हुए स्नैक्स की जगह हेल्दी स्नैक विकल्प जैसे भुना चना, मखाना या अन्य कम तेल वाले विकल्प चुने जा सकते हैं। इससे स्वाद की इच्छा भी पूरी हो सकती है और रोज़ के खाने में अनावश्यक तेल और कैलोरी कम रखने में मदद मिलती है।
गली के उस चाट वाले ठेले का डायबिटीज़ और मोटापे का सीधा कनेक्शन
बार-बार तला-भुना और ज़्यादा चीनी वाला खाना सीधे तौर पर इंसुलिन रेज़िस्टेंस (insulin resistance) बढ़ाता है, जो टाइप 2 डायबिटीज़ और मोटापे की जड़ में होता है। यह सिर्फ “कैलोरी ज़्यादा है” की बात नहीं, शरीर के अंदर की एक असली प्रक्रिया है।
इंटरनेशनल डायबिटीज़ फेडरेशन के मुताबिक भारत में करीब 7.7 करोड़ लोग टाइप 2 डायबिटीज़ के साथ जी रहे हैं, और शहरों में मोटापा पिछले कुछ दशकों में तेज़ी से बढ़ा है। डॉक्टरों के मुताबिक, ऐसे हाई-कैलोरी स्नैक्स न सिर्फ मोटापा बढ़ाते हैं, बल्कि फैटी लिवर, इंसुलिन रेज़िस्टेंस, और पाचन से जुड़ी दिक्कतें भी पैदा कर सकते हैं (इंडियाटाइम्स की रिपोर्ट में उद्धृत)।
यही कारण है कि सरकार का यह कदम सिर्फ एक “एडवाइज़री” नहीं, बल्कि एक बढ़ते हुए सेहत संकट की तरफ इशारा है।

शरीर के चेतावनी संकेत जिन्हें नज़रअंदाज़ न करें
लगातार ऐसा खाना खाने से पहले शरीर कुछ शुरुआती संकेत दे सकता है। इन्हें समय रहते पहचानना ज़रूरी है:
- बार-बार भूख या मीठे की तलब लगना
- खाने के तुरंत बाद बहुत थकान महसूस होना
- पेट के आस-पास वज़न तेज़ी से बढ़ना
- बार-बार प्यास लगना या मुँह सूखना
- रात में नींद ठीक से न आना
- घाव या कट का देर से भरना
- हाथ-पैर में झनझनाहट महसूस होना
अगर इनमें से कोई भी लक्षण लगातार बना रहे, तो इसे सिर्फ खान-पान की आदत मानकर नज़रअंदाज़ न करें। खासकर बार-बार प्यास लगना, घाव देर से भरना या हाथ-पैर में झनझनाहट जैसे संकेतों के साथ ब्लड शुगर में बदलाव हो सकता है। वहीं, मीठे की बार-बार तलब, पेट के आसपास बढ़ता वज़न और खाने के बाद थकान जैसे संकेतों के साथ नींद और मेटाबॉलिक हेल्थ पर भी ध्यान देना जरूरी है।
अगर ऐसे लक्षण बार-बार दिखाई दे रहे हैं, तो अपनी स्थिति का पता लगाने के लिए ब्लड शुगर और HbA1c जैसी जाँचों के बारे में डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है।
आज से आप क्या कर सकते हैं
खान-पान में बड़े, अचानक बदलाव की ज़रूरत नहीं, कुछ छोटे लेकिन ठोस कदम असली फर्क ला सकते हैं:
- हफ्ते में तली हुई चीज़ों को गिनें, “कभी-कभार” को 1-2 बार तक सीमित रखें, रोज़ाना नहीं
- घर पर वही समोसा या चाट बनाते समय एयर-फ्रायर या कम तेल का तरीका आज़माएं
- मीठे में गुड़ या फल का इस्तेमाल करें, रिफाइंड चीनी की जगह
- ठेले से खाना खरीदते समय एक बार पूछें कि तेल कितनी बार बदला जाता है
- पैकेज्ड स्नैक्स खरीदते समय लेबल पर चीनी और फैट की मात्रा ज़रूर पढ़ें
- हफ्ते में कम से कम 5 दिन, 30 मिनट तेज़ चलना या टहलना शामिल करें
| डॉक्टर की राय “हम मरीज़ों से यह नहीं कहते कि समोसा या चाट हमेशा के लिए बंद कर दें। हम पूछते हैं कि यह हफ्ते में कितनी बार हो रहा है, और उसके साथ शरीर की और क्या आदतें जुड़ी हैं, नींद, चलना-फिरना, तनाव। असली बदलाव वहीं से शुरू होता है।” डॉ. गुरुदत्त अमीन, बीएएमएस, एमडी, पीजीडीईएमएस 19+ वर्षों का क्लिनिकल अनुभव, सीएमओ, माधवबाग |
क्या आयुर्वेद डायबिटीज़ और मोटापे को एक साथ मैनेज कर सकता है?
डायबिटीज़ और मोटापा अक्सर एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। बढ़ता वज़न, पेट की चर्बी और इंसुलिन रेजिस्टेंस ब्लड शुगर को कंट्रोल करना मुश्किल बना सकते हैं। ऐसे में केवल वज़न कम करने या केवल ब्लड शुगर पर ध्यान देने के बजाय, दोनों से जुड़े जोखिमों को साथ समझना ज़रूरी है।
आयुर्वेद में उपचार व्यक्ति की प्रकृति, वर्तमान स्वास्थ्य स्थिति और लक्षणों को ध्यान में रखकर तय किया जाता है। डायबिटीज़ और मोटापे के मामले में डॉक्टर की निगरानी में पंचकर्म, आयुर्वेदिक औषधियों, आहार में बदलाव और नियमित शारीरिक गतिविधि को उपचार योजना का हिस्सा बनाया जा सकता है। इसका उद्देश्य केवल कुछ किलो वज़न कम करना नहीं, बल्कि वज़न और मेटाबॉलिक हेल्थ से जुड़े बदलावों पर काम करना है।
माधवबाग में डायबिटीज़ और मोटापे के लिए क्या अलग है?
माधवबाग का दृष्टिकोण केवल एक पंचकर्म प्रक्रिया या एक डाइट चार्ट तक सीमित नहीं है। मरीज की शुरुआत हेल्थ असेसमेंट से होती है, जिसमें वज़न, BMI, कमर की माप, ब्लड शुगर, ब्लड प्रेशर और अन्य ज़रूरी स्वास्थ्य मानकों को देखा जाता है। इसके आधार पर डॉक्टर तय करते हैं कि मरीज के लिए किस तरह की आयुर्वेदिक थेरेपी और लाइफस्टाइल सपोर्ट उपयुक्त रहेगा।
ज़रूरत के अनुसार उपचार में पंचकर्म-आधारित थैरेपी, आयुर्वेदिक दवाएं, व्यक्तिगत डाइट प्लान और एक्सरसाइज़ को शामिल किया जा सकता है। डायबिटीज़ और मोटापे के साथ हाई BP, हाई कोलेस्ट्रॉल या अन्य मेटाबॉलिक जोखिम मौजूद हों, तो उन्हें भी उपचार योजना में ध्यान में रखा जाता है। इस तरह मरीज को केवल “वज़न घटाने” का लक्ष्य देने के बजाय उसकी पूरी मेटाबॉलिक हेल्थ को समझकर आगे बढ़ा जाता है।

आयुर्वेद और माधवबाग डायबिटीज़-मोटापे में मदद के लिए क्या असल सबूत हैं
माधवबाग के अपने प्रकाशित शोध में एक संरचित, डॉक्टर की निगरानी वाले पंचकर्म-आधारित प्रोग्राम में डायबिटीज़ के मरीज़ों पर मापने लायक सुधार दर्ज किया गया है। यह असल आंकड़ों पर आधारित नतीजा है।
माधवबाग के एक अध्ययन में, जिन मरीज़ों का शुरुआती HbA1c 6.6–9.0% था, उनका औसत HbA1c 90 दिन के संरचित प्रोग्राम के बाद घटकर 6.12% रह गया (Kshirsagar, Lakariya and Khan, 2024)। एक अलग अध्ययन में, इसी तरह के प्रोग्राम पर मौजूद मरीज़ों का औसत वज़न 90 दिनों में 68.31 किलो से घटकर 63.82 किलो हुआ, साथ ही कमर की माप और कोलेस्ट्रॉल में भी सुधार देखा गया (Muramkar, Kulthe and Ghadigaonkar, 2024)।
यह डाइट, पंचकर्म थैरेपी और जीवनशैली में बदलाव को साथ लेकर काम करने का नतीजा है, अकेले किसी एक चीज़ का नहीं।
क्या आपका HbA1c भी इस तरह सुधार की गुंजाइश दिखाता है? अपना HbA1c और संबंधित स्वास्थ्य जानकारी दर्ज करके माधवबाग का Diabetes Reversal Score देखें और अपनी स्थिति को बेहतर तरीके से समझें।
एक मरीज की कहानी: जब डायबिटीज़ के साथ वज़न भी बना चुनौती
माधवबाग की प्रकाशित केस स्टडी में मीरा रोड, मुंबई के 38 वर्षीय पुरुष का मामला सामने आता है। वे पिछले 8 वर्षों से टाइप 2 डायबिटीज़ के साथ गंभीर मोटापे और बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल से जूझ रहे थे। उपचार की शुरुआत में उनका वजन 144 किलो, BMI 51, HbA1c 11.5% और LDL 151 mg/dL था। डॉक्टर की निगरानी में उन्हें पंचकर्म आधारित आयुर्वेदिक उपचार, व्यक्तिगत आहार योजना, नियमित पैदल चलना और व्यायाम को शामिल करते हुए एक व्यवस्थित उपचार कार्यक्रम दिया गया।
तीन महीने बाद उनका वजन 144 किलो से घटकर 120 किलो, BMI 51 से 42, HbA1c 11.5% से 6.2% और LDL 151 से 80 mg/dL हुआ। साथ ही, चलने-फिरने और रोज़मर्रा की गतिविधियों में भी सुधार दर्ज किया गया। यह केस दिखाता है कि माधवबाग में पंचकर्म को अकेले उपचार के रूप में नहीं, बल्कि व्यक्तिगत आहार, व्यायाम, आयुर्वेदिक उपचार और नियमित चिकित्सकीय निगरानी के साथ वजन और डायबिटीज़ प्रबंधन के एक व्यवस्थित तरीके के हिस्से के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
यह किसी एक मरीज के परिणाम को हर व्यक्ति पर लागू होने की गारंटी नहीं देता। डायबिटीज़ और मोटापे में परिणाम उम्र, बीमारी की अवधि, दवाओं, शुरुआती वजन, खान-पान और दूसरी स्वास्थ्य स्थितियों के अनुसार अलग हो सकते हैं। इसलिए ऐसे उदाहरणों को उम्मीद और संदर्भ के रूप में देखें, निश्चित परिणाम के वादे के रूप में नहीं।
क्या आपका अगला कदम पंचकर्म या सिर्फ डाइट नहीं, सही असेसमेंट होना चाहिए?
अगर डायबिटीज़ के साथ वज़न बढ़ रहा है, पेट की चर्बी कम नहीं हो रही है या बार-बार डाइट और एक्सरसाइज़ के बावजूद वजन वापस बढ़ रहा है, तो शुरुआत खुद से कोई पंचकर्म या डाइट शुरू करने के बजाय डॉक्टर से हेल्थ असेसमेंट कराने से करें।
माधवबाग में आपका स्वास्थ्य मूल्यांकन होने के बाद डॉक्टर यह समझने में मदद कर सकते हैं कि आपके लिए पंचकर्म-आधारित आयुर्वेदिक उपचार उपयुक्त है या नहीं और इसे डाइट, एक्सरसाइज़ और अन्य आवश्यक देखभाल के साथ कैसे जोड़ा जा सकता है।अपने नज़दीकी माधवबाग क्लिनिक या हॉस्पिटल में जाकर अपनी स्वास्थ्य स्थिति का मूल्यांकन करें।
समय पर किया गया सही मूल्यांकन आपको अपने वज़न और मेटाबॉलिक हेल्थ को बेहतर तरीके से समझने और आगे की सही दिशा तय करने में मदद कर सकता है।
अगर आपको डायबिटीज़ या मोटापे से जुड़ी चिंता है, एक कंसल्टेशन आपकी सही स्थिति समझने में मदद कर सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
क्या सरकार ने वाकई समोसे-जलेबी पर बैन लगा दिया है?
नहीं। स्वास्थ्य मंत्रालय ने साफ किया है कि यह किसी स्नैक पर बैन नहीं है, बल्कि सरकारी दफ्तरों में “Oil and Sugar Boards” लगाने की एक जागरूकता पहल है, जो छुपी हुई चीनी और तेल की मात्रा के बारे में बताती है।
HFSS फूड का मतलब क्या है?
HFSS का मतलब है High Fat, Sugar, Salt यानी ऐसा खाना जिसमें तय सीमा से ज़्यादा चीनी, तेल या नमक हो। ICMR-NIN के मुताबिक 10% से ज़्यादा कैलोरी चीनी से या 15% से ज़्यादा तेल से आने पर खाना इस श्रेणी में आता है।
क्या रोज़ चाट या समोसा खाने से डायबिटीज़ हो सकता है?
बार-बार, नियमित रूप से ऐसा तला-भुना और मीठा खाना इंसुलिन रेज़िस्टेंस बढ़ाता है, जो टाइप 2 डायबिटीज़ के खतरे को बढ़ाता है। यह अकेला कारण नहीं होता, लेकिन एक बड़ा योगदान देने वाला कारक ज़रूर है।
FSSAI का लाल चेतावनी लेबल क्या है?
यह एक प्रस्तावित योजना है जिसके तहत पैकेज्ड खाने पर, जिसमें ज़्यादा चीनी, नमक या फैट हो, आगे की तरफ स्पष्ट लाल निशान दिखाया जाएगा, ताकि लोग बिना पीछे का न्यूट्रिशन लेबल पढ़े भी तुरंत समझ सकें।
आयुर्वेद डायबिटीज़ और मोटापे में कैसे मदद कर सकता है?
एक संरचित, डॉक्टर की निगरानी वाला आयुर्वेदिक प्रोग्राम, जिसमें व्यक्तिगत डाइट, पंचकर्म थैरेपी और जीवनशैली में बदलाव शामिल हों, ब्लड शुगर और वज़न दोनों में मापने लायक सुधार ला सकता है, जैसा कि Madhavbaug के प्रकाशित शोध में देखा गया है।
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संदर्भ (References)
PIB India (2025) ‘Advisory issued by Union Health Ministry to display Oil and Sugar Boards in workplaces‘, Press Information Bureau, Government of India, जुलाई 2025।
ICMR-National Institute of Nutrition (2024) ‘Dietary Guidelines for Indians 2024‘, भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद।
The Live Nagpur (2026) ‘Foods High in Sugar, Salt and Fat May Soon Carry Red Warning Labels Under FSSAI Plan’, सितंबर 2026।
AOL/PA Media (2025) ‘Did India roll out health warnings for popular street foods like samosas and jalebis?’, जुलाई 2025 (डॉ. अमर अमाले और डॉ. राजीव कोविल के उद्धरण सहित)।
Kshirsagar, J., Lakariya, A. and Khan, S. (2024) ‘Impact of ayurvedic panchakarma along with lifestyle modification in restoring glucose tolerance in type 2 diabetics’, International Journal of Basic & Clinical Pharmacology, 13(5), pp. 669–672.
Muramkar, P.S., Kulthe, N. and Ghadigaonkar, P. (2024) ‘Effect of ayurveda-based panchakarma and lifestyle modification on global longitudinal strain in cardiac disorder patients’, International Journal of Advances in Medicine, 11(6), pp. 566–570.






